राजस्थान में जल संसाधन: चुनौतियाँ और पारंपरिक संरक्षण विधियाँ
राजस्थान भारत का सबसे शुष्क राज्य है, जहाँ देश के कुल सतही जल का केवल 1.16% हिस्सा ही उपलब्ध है। यहाँ वर्षा की अनिश्चितता और मरुस्थलीय परिस्थितियों के कारण जल संरक्षण की परंपरा सदियों पुरानी है।
1. पारंपरिक जल संरक्षण विधियाँ (Traditional Methods)
प्राचीन काल से ही राजस्थान के लोगों ने जल संचयन की अनूठी तकनीकें विकसित की हैं:
- खड़ीन (Khadin): जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित यह तकनीक कृषि और जल संचयन का बेहतरीन उदाहरण है।
- टांका (Tanka): थार मरुस्थल में वर्षा जल को एकत्रित करने के लिए घरों या खेतों में बनाए गए भूमिगत पक्के टैंक।
- बावड़ी (Stepwell): प्राचीन काल में निर्मित कलात्मक कुएँ, जिनमें नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती हैं (जैसे आभानेरी की चाँद बावड़ी)।
- टोबा (Toba): नाडी के समान संरचना, लेकिन इसकी गहराई नाडी से अधिक होती है।
- झालरा (Jhalra): ये मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और स्नान के लिए बनाए गए जल स्रोत थे, जिनका अपना कोई जल स्रोत नहीं होता (ये कुओं या कुंडों के रिसाव से भरते हैं)।
2. आधुनिक जल परियोजनाएँ (Major Projects)
| परियोजना का नाम | नदी/स्रोत | लाभान्वित क्षेत्र |
|---|---|---|
| इन्दिरा गांधी नहर (IGNP) | सतलुज एवं व्यास (हरिके बैराज) | उत्तर-पश्चिमी राजस्थान (मरुगंगा) |
| बीसलपुर परियोजना | बनास नदी | टोंक, अजमेर, जयपुर (पेयजल) |
| माही बजाज सागर | माही नदी | बांसवाड़ा, डूंगरपुर |
3. मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान
राजस्थान सरकार द्वारा जल स्तर को सुधारने और जल संचयन के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं। 'बूंद-बूंद सिंचाई' (Drip Irrigation) और 'फव्वारा सिंचाई' (Sprinkler) को राज्य में विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि कम जल में अधिक उत्पादन हो सके।
परीक्षा उपयोगी तथ्य: राजस्थान का **'राजसमंद झील'** एकमात्र ऐसी झील है जिसके नाम पर जिले का नाम पड़ा है। साथ ही, **'सांभर झील'** भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय नमक की झील है। ऊपर दी गई क्विज़ के माध्यम से अपनी तैयारी का स्व-मूल्यांकन करें।
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